इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक नए साल की शुरुआत मुहर्रम के महीने से ही होती है मुहर्रम किसी त्यौहार या ख़ुशी का महीना नहीं है बल्कि यह महीना बेहद गम से भरा हुआ है इतना ही नहीं दुनिया की तमाम इंसानियत के लिए यह महीना इबरत करने के लिए है

आज से लगभग 14 साल पहले मुहर्रम के महीने में इस्लामिक तारीख की एक ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली जंग हुई थी इस जंग की दास्तान सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और आपकी रूह का उठ जाएगी बातिल के खिलाफ इंसाफ की जंग लड़ी गई थी जिसमें अहले बैत ने अपनी जान कुर्बान का इस्लाम को बचाया था.

इस जंग में जुल्म की हार हो गई जब इराक की राजधानी बगदाद से करीब 120 किलोमीटर दूर कर्बला में बादशाह यजीद के पत्थर दिल फरमानो ने महज 6 महीने के अली असगर को पानी तक नहीं पीने दिया जहाँ भूख प्यास से एक माँ के सीने का दूध खुश हो गया और जब अजीत की फ़ौज ने पैगम्बर मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को नमाज़ पढ़ते समय सजदे में ही बड़ी बेरहमी से कत्ल कर दिया.

इस जंग में इमाम हुसैन के साथ उनके 72 साथियों को भी बड़ी बेरहम से सहित कर दिया गया उनके घरों में भी आग लगा दी गई और परिवार के बचे हुए लोगों कैदी बना लिया गया जुल्म की इम्तिहान तब भी जब इमाम हुसैन के साथ उनके 6 महीने के मासूम बेटे अली असगर 18 सल के अली अकबर और 7 साल के उनके भतीजे हसन बेटे कासिम को बड़ी बेरहमी से शहीद किया गया.

शहादत की अनोखी मिशाल है मुहर्रम

मुहर्रम एक महीना है जिसमें 10 दिन इमाम हुसैन के शोक में मनाए जाने वाला पर्व है इस महीने में मुसलमानों के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब मुस्तफा सलालाह अल्लैही वा सल्लम ने मक्का से मदीना में हिजरत किया था

कर्बला यानि आज का सीरियल जहाँ सुण सात हिजरी को यज़ीद इस्लाम धर्म का खलीफा बन बैठा वह अपने वर्चस्व को पुरे अरब में फैलाना चाहता था जिसके लिए उसके पास सबसे बड़ी चुनौती पैगम्बर मोहम्मद के खानदान का इकलौता चिराग इमाम हुसैन जो किसी भी हालत में यजीद के सामने झुकने को तैयार नहीं थे

इसी वजह से सां 61 हिजरी से यजीद के अत्याचार बढ़ने लगे.ऐसे में वह के बादसाह हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक के शहर कूफ़ा जाने लगे पर रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया.जब हुसैन का काफिला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका. वह पानी का एक ही साधन था फरात नदी थी,जिस पर यजीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी के लिए लगा दी थी .बावजूद इसके इमाम हुसैन नहीं झुके.यज़ीद के प्रतिनिधित्व की इमाम हुसैन को झुकाने की हर कोशिश नाकाम होती रही और आखिर में युद्ध का ऐलान हो गया.

इतिहास कहता है की यज़ीद 80000 की फौज के सामने हुसैन के हुसैन के 72 बहादुरों ने जिस तरह जंग की उसकी मिशाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक दुसरे को देने लगे लेकिन हुसैन कहा जंग जितने आये थे वह तो अपने आप को अल्लाह की राह में त्याग्ने आये थे.

उन्होंने अपने नाना और पिता के सिखाये हुए उच्च विचार और अल्लाह से बेपनाह मोहब्बत में प्यास दर्द भूख पर विजय प्राप्त कर ली दसवीं मोहरम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और साथियों के जनाजे को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया और फिर दुश्मन उन्हें मार नहीं सके आखिर में अस्र की नमाज़ के वक़्त इमाम हुसैन जब सजदा कर रहे थे तब एक याजिदी को लगा कि अभी सही वक़्त है हुसैन को मारने का फिर उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया लेकिन इमाम हुसैन तोमार कर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए पैर या जीत तो जीत कर भी हार गया उसके बाद अरब में क्रांति आई रूह काँप उठी और हर आँखों से आंसू निकल गए और इस्लाम ग़ालिब हुआ.

मुहर्रम में क्या करते हैं

मोहरम में कई लोग रोजे रखते हैं पैग़म्बर साहब के नाती की शहादत और कर्बला के शहीदों के बलिदानों को याद किया जाता है

कर्बला के शहीदों ने इस्लाम धर्म को नया जीवन प्रदान किया था कई लोग इस माह में पहले 10 दिनों तक रोज़े रखते हैं जो लोग 10 दिनों के रोज़े नहीं रख पाते नौ और 10 तारीख को रोजे रखते हैं इस दिन पूरे देश में लोगों की अटूट आस्था का भरपूर समागम देखने को मिलता है लोग जहाँ जगह में पानी और शरबत बांटते है .

माहे मुहर्रम के रोज़े की फ़ज़ीलत

यु तो तमाम महीने और उनमे किये जाने वाले नेक अमल अल्लाह की बारगाह में क़बूल और मक़बूल होते है पर खास महीने और दिन ऐसे और दिन ऐसे भी होते है.जिनके अहमियत आम दिन व महीने के मुकाबले बहुत ज़्यादा होती है जिनमे से 4 महीने अल्लाह की बारगाह में बड़े मक़बूल है जिसका जिक्र कुरान पाक में है.

ये चार महीने है ज़ुल हिज्जा मुहर्रम और रमजान यानी इस्लामी साल के 9 महीना इस माह माहे मुहर्रम उल हरम भी अल्लाह की बारगाह में बड़ा मक़बूल है इस्लाम के नए साल सुन्नी शाही अक़ीदा इस साल की शुरुआत ही जिक्र सरदार शहीद ए आज़म इमाम हुसैन इब्न अली रदियल्लाह अन्हु की शहादत और अहले बेत के फ़ज़ाइल मनाक़िब बयां करते है.

आशूरा यानी 10 मुहर्रम को रोज़े रखने की फ़ज़ीलत

हज़रत अबु हुरैरा है रसूल अल्लाह ने फ़रमाया सब रोजो में अफजल रमजान का रोजा और उसके बाद मोहरम का रोजा है जो अल्लाह का महीना है और ब दे नमाज तहजुद् की नमाज है

जब नबी ए करीम मदीना तशरीफ़ लाएं तो यहूदियों को देखा और सूर्य के दिन रोजा रखते हैं नबी अकरम ने पूछा रोज़ा क्यों रखे हो

उन्होंने कहा की वह मुबारक दिन है जब अल्लाह ने बनि इजराइल को उनके दुश्मन से निजात दी तो हज़रात मूसा अलैहिस्सलाम इस दिन रोजा रखा

नाउ ारदास का रोजा रखना सुन्नत है अगर कोई मुस्लिम रोजा किसी ऐसी वजह से न रख सका की उसका तबियत या कोई मज़बूरी हो तो उसको माह में दो रोजा रखना चाहिए जब मौका मिले फिर भी अगर न रख सके तो कोई गुनाह नहीं है लेकिन अगर कोई शख्स हो अच्छा खासा तन्दुरुस्त पैर रोजा सिर्फ खिचड़ा सरबत के चक्कर के चक्कर में छोड़ दे और या फिर तन्दुरुस्ती की फुर्सत के लिए छोड़ दे फिर खुद को बहुत बड़ा हुसैनि होने का दावा भी करें तो यकीन जान ले यह दावा झूठा है और शैतान का वस्वसा है

इमाम हुसैन इब्न अली रज़ियाल्लाहु की नियाज़ करना

शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस रहमतुल्लाहि जिन्को देवबन्दी हदीस वहां भी दोनों फ़िराक मानने का दावा करते हैं वह इमाम हुसैन इब्ने अली नियाज के मुत्ताइएक लिखते है की:

अगर मैदा और चावलों की खीर किसी बुजुर्ग के लिए फटिया के बाद उसे खिलाया जाए स्वाद की नीयत से तो कोई हर्ज नहीं

एक हम मसाला अक्सर हमारे कुछ सुन्नी हजरत अपनी काम इल्मी और जहालत की बिना पर काम इल्मी और जहालत की बिना पर कुछ ऐसा काम करते हैं जो शरीयतों में दुरुस्त नहीं है कुछ लोगों को हमने देखा है की खाने की चीज को तजिया बनाकर उसे पैर वह खाने की चीज चढ़ाते हैं और फिर नियाज कह के तबर्रुक समझ के खाना खिलाना शुरू कर देते हैं

हज़रात इमाम की नियाज खानी चाहिए और ताजिया का चढ़ा हुआ न खाना चाहिए तजिया पैर चढाने से हज़रात इमाम हुसैन की नियाज नहीं हो जाती और अगर नियाज देकर चढ़ाएं या चढ़कर निआज़ दिलाएं तो उसे खाने से एतराज़ चाहिए

अशुरे के दिन कुछ बेहतरीन अमल करें

  1. गुसल करें
  2. सुरमा लगाएं
  3. रोज़ा रखे
  4. नफिल पढ़े
  5. सूरा: एखलास को कसरत से पढ़ें
  6. नबी और आले नबी के दरूद शरीफ पढ़े
  7. मरीजों की ख़िदमत करें
  8. यतीमो के सर पर हाथ फेरे
  9. घर वालों के खाने में कंजूसी न करें

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